UCC की शुरुआत उत्तराखंड से हुई और यह एक राज्य से दूसरे राज्य में आगे बढ़ रही है। यह प्रक्रिया सिर्फ़ कानूनी प्रक्रियाओं पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक सहमति पर भी निर्भर करती है। चार राज्य पहले ही UCC बिल पास कर चुके हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 2 अक्टूबर, 2026 को गुजरात यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल, 2026 को औपचारिक मंज़ूरी दी। उत्तराखंड के बाद, गुजरात देश का दूसरा राज्य बन गया जहाँ UCC लागू हुआ। 3 अक्टूबर, 2026 को असम के UCC बिल को भी राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिल गई। 4 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता में कहा, "मुझे छह महीने दें; UCC ज़रूर लागू किया जाएगा।" इसका मतलब है कि UCC लागू करने का काम अमित शाह की समय-सीमा से पहले पूरा हो सकता है। तो, किन राज्यों में UCC लागू हो चुका है, और 2029 तक इसे पूरी तरह लागू करने के लक्ष्य का क्या मतलब है?
आइए सीधे मुद्दे पर आते हैं: यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड, यानी UCC।
अभी देश में शादी, तलाक़, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों के लिए अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग कानून हैं। UCC का मकसद इन मामलों में धर्म, जाति और समुदाय से ऊपर उठकर सभी के लिए एक ही कानून लागू करना है।
13 सितंबर, 2026 को गृह मंत्री अमित शाह ने मुंबई में कहा, "मुझे भरोसा है कि 2029 से पहले BJP-NEDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू हो जाएगा।" यह बयान ऐसे समय में आया जब उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन चुका था जहाँ UCC लागू हुआ था, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश अपने-अपने बिल पहले ही पास कर चुके थे।
पूरे देश में एक साथ UCC क्यों नहीं लाया जा रहा है?
इसका जवाब संविधान के अनुच्छेद 44 में है, जिसमें कहा गया है कि राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। यह अनुच्छेद राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) का हिस्सा है, जिसे अनुच्छेद 37 के तहत अदालतों द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता। दूसरे शब्दों में, हालाँकि संविधान सरकारों को यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (UCC) बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है, लेकिन यह उन्हें ऐसा करने के लिए कानूनी रूप से मजबूर नहीं करता है।
एक और बड़ी मुश्किल यह है कि शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामले संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) की एंट्री 5 के तहत आते हैं। इसका मतलब है कि संसद और राज्य विधानसभाओं, दोनों को इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन राज्य की शक्ति पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है। अनुच्छेद 254(2) के तहत, अगर किसी राज्य का कानून संसद द्वारा बनाए गए मौजूदा कानून से टकराता है, तो उसे उस राज्य में तभी लागू किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिल जाए।
यह सिर्फ़ एक संवैधानिक मुद्दा नहीं है; इसमें राजनीतिक हिसाब-किताब भी उतनी ही अहम भूमिका निभाता है। भारत में कई तरह के आदिवासी समुदाय और पूर्वोत्तर राज्य हैं, जिनकी अपनी अलग-अलग परंपराएँ हैं। इन सभी को एक ही राष्ट्रीय UCC में मिलाना बहुत मुश्किल काम होता। इसलिए, RSS और BJP ने शुरू से ही यह रणनीति अपनाई कि BJP शासित राज्य पहले अपने-अपने कोड बनाएँ और केंद्र स्तर पर एक व्यापक कानून बनाने पर बाद में विचार किया जाए।
देश में अब तक UCC कहाँ-कहाँ लागू हुआ है?
उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जिसने UCC लागू किया है। यह 27 जनवरी, 2025 को लागू हुआ। सिर्फ़ एक साल के अंदर, 4.74 लाख से ज़्यादा शादियों का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन हुआ—यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जो पहले पूरी तरह से ऑफ़लाइन होती थी। जनवरी 2026 में, सरकार ने UCC (संशोधन) अध्यादेश, 2026 भी जारी किया, जिससे प्रक्रियाएँ और भी पारदर्शी और आसान हो गईं।
गुजरात दूसरा राज्य है जिसे अपने UCC कानून के लिए राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली है। यह बिल मार्च 2026 में पास हुआ था। यह कानून शादी के 60 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन को ज़रूरी बनाता है। यह एक से ज़्यादा शादियों (पॉलीगैमी और बिगैमी) पर रोक लगाता है, लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करता है, और बेटे-बेटियों को संपत्ति में बराबर का अधिकार देता है। असम पूर्वोत्तर का पहला राज्य है जिसने मई 2026 में UCC बिल पास किया। इसे राष्ट्रपति की मंज़ूरी का इंतज़ार है, जिसके बाद इसे तीन से छह महीने के अंदर लागू किया जा सकता है।
मध्य प्रदेश को जुलाई 2026 में कैबिनेट की मंज़ूरी मिली और सितंबर में विधानसभा में बिल पास हुआ। यहाँ, लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन एक महीने के अंदर कराना ज़रूरी कर दिया गया है। शादी का रजिस्ट्रेशन भी गाँव के स्तर तक अनिवार्य कर दिया गया है।
महाराष्ट्र में सात सदस्यों वाली एक ड्राफ्टिंग कमेटी बनाई गई है, जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस रंजना देसाई हैं। हालाँकि, पैनल के सदस्य और बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आर.सी. चव्हाण के इस्तीफ़े ने कमेटी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पश्चिम बंगाल में भी जुलाई 2026 में UCC बिल की जाँच के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा है कि UCC ज़रूर लागू किया जाएगा, भले ही इसमें छह महीने लग जाएँ।
राजस्थान में भी विधानसभा में UCC बिल पेश किया गया है और इसे लागू करने की तैयारी चल रही है; ऐसा करने वाला यह पाँचवाँ BJP-शासित राज्य बन गया है।
UCC से आदिवासियों को क्यों बाहर रखा गया?
जहाँ-जहाँ UCC बिल...
देश भर में इसे लागू करने के बावजूद, अनुसूचित जनजातियों (ST) को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। उत्तराखंड, गुजरात, असम, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने ST समुदायों को UCC से छूट दी है ताकि उनके रीति-रिवाजों और कानूनी अधिकारों की रक्षा की जा सके।
यह सिर्फ़ राजनीतिक उदारता का काम नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 366(25) और 342 के तहत आदिवासी रीति-रिवाजों को सुरक्षा दी गई है। दूसरे शब्दों में, ST को UCC से छूट देना एक संवैधानिक ज़रूरत भी है।
अब, विपक्ष का रुख़ देखते हैं।
कांग्रेस ने UCC को लेकर सरकार पर सीधा हमला बोला है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा, "UCC एक 'बुलडोज़र' है जिसका मकसद समाज को हमेशा के लिए बांटना है।" कांग्रेस का तर्क है कि सरकार UCC का इस्तेमाल कानूनी सुधार के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए कर रही है। कांग्रेस 2018 की 21वें विधि आयोग की रिपोर्ट का हवाला देती है, जिसमें साफ़ तौर पर कहा गया था कि इस समय UCC न तो ज़रूरी है और न ही... वांछनीय।
सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख़ है?
अप्रैल 2026 में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि UCC एक "संवैधानिक आकांक्षा" है और इसका किसी खास धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने शरिया कानून के तहत विरासत के मामलों में महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि संवेदनशील मुद्दों पर अंतिम फ़ैसला—जैसे शरिया कानून के प्रावधानों को रद्द करना—विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।
तो, आइए अब सीधे 2029 से जुड़े सवाल पर आते हैं...
जानकारों के मुताबिक, अमित शाह की 2029 की समय-सीमा सिर्फ़ एक राजनीतिक बयान नहीं है। यह चरणबद्ध तरीके से UCC लागू करने की BJP की लंबे समय से चली आ रही रणनीति का एक समय-सीमा वाला रूप है। कानून मंत्रालय के सूत्रों से पता चलता है कि राष्ट्रीय UCC का मसौदा तैयार करने के बजाय, केंद्र सरकार उत्तराखंड मॉडल को आधार बनाकर NDA-शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
अभी तक चार राज्यों ने UCC बिल पास किया है। इनमें से इसे पूरी तरह से सिर्फ़ उत्तराखंड में लागू किया गया है। गुजरात और असम को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिल गई है, जबकि बाकी राज्यों को अभी भी इसका इंतज़ार है। इसका मतलब है कि 2029 तक 21 राज्यों का लक्ष्य हासिल करने के लिए, BJP को अगले तीन सालों में 17 और राज्यों में UCC लागू करना होगा।
NDA के सहयोगी दल जैसे JD(U), LJP और TDP पहले से ही इस मुद्दे पर सावधानी भरा रुख अपना रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सरकार को खुली चुनौती दी है कि अगर उनमें हिम्मत है तो वे संसद में UCC बिल लेकर आएं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी UCC का विरोध किया है।