- लालू को कांग्रेस के प्लान 'PK' की भनक लग गई थी! इसलिए खेला अपना सबसे बड़ा दांव 'M'

सोनिया गांधी के सबसे करीबी लोगों में से एक होने के बावजूद लालू प्रसाद यादव ने राहुल गांधी की जगह ममता बनर्जी का पक्ष लिया है। लालू इंडिया ब्लॉक का नेतृत्व ममता बनर्जी को सौंपने की बात करते हैं। उनका यह रुख लोगों को हैरान कर रहा है। सच तो यह है कि जैसे ही लालू को बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar News) के मद्देनजर कांग्रेस की रणनीति की भनक लगी, उन्होंने दबाव बनाने के लिए राहुल से दूरी बनाने के संकेत दे दिए।

  • कांग्रेस और आरजेडी में खींचतान
  • लालू कांग्रेस के दांव को नाकाम कर रहे हैं
  • कांग्रेस भी दिखा रही है तेवर
  • सीटों और कांग्रेस के चरित्र पर विवाद

बिहार (Bihar Election 2025) में इंडिया ब्लॉक के अंदर प्रेशर पॉलिटिक्स शुरू हो गई है. आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने यूं ही राहुल गांधी की जगह ममता बनर्जी को इंडिया ब्लॉक की कमान सौंपने की वकालत नहीं की है. इसके पीछे एक सोची-समझी चाल है. लालू को पता चल गया है कि कांग्रेस अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में न सिर्फ सीटों पर जोर देगी, बल्कि उन चेहरों को भी आगे लाएगी जो लालू यादव को पसंद नहीं हैं. कांग्रेस की रणनीति की भनक जैसे ही लालू को लगी, उन्होंने अपनी रणनीति बदल दी. लालू किसी भी सूरत में तेजस्वी के सामने उन 'दो चेहरों' के उभरने के खिलाफ रहे हैं.

कांग्रेस की रणनीति क्या है?

कांग्रेस करीब तीन दशक से बिहार में आरजेडी की पिछलग्गू बनी हुई है। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव तय करते रहे हैं कि राज्य में कांग्रेस का नेतृत्व कौन करेगा। पिछले साल लालू ने कांग्रेस कार्यालय का दौरा भी किया था और पार्टी कार्यकर्ताओं को बताया था कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह को राज्यसभा भेजने में उनकी क्या भूमिका थी। उन्होंने दावा किया था कि उनके आग्रह पर ही सोनिया गांधी ने अखिलेश सिंह को राज्यसभा भेजा था।

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कांग्रेस अब अनुयायी

वाली छवि बदलने की योजना बना चुकी है। हरियाणा और महाराष्ट्र में हार के बाद कांग्रेस द्वारा किए गए मंथन में दो बातें उभरकर सामने आईं। पहली, कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। दूसरी, विधानसभा चुनाव में जाति जनगणना और संविधान पर खतरे जैसे राष्ट्रीय मुद्दे उठाने के बजाय पार्टी स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेगी। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में पार्टी की सभी इकाइयों को भंग करके इसकी शुरुआत भी कर दी है।

ये है कांग्रेस का 'प्लान पीके'

कांग्रेस बिहार में संगठनात्मक ढांचे में भी बदलाव करेगी। इतना ही नहीं, पार्टी अभी से चुनाव के लिए कुछ स्थानीय चेहरों को आगे लाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए कांग्रेस ने प्लान पीके बनाया है। इस कड़ी में पहला नाम 'पी' यानी पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव और दूसरा नाम 'के' यानी जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके कन्हैया कुमार का है। कन्हैया कुमार और पप्पू यादव से लालू यादव और तेजस्वी यादव की नाराजगी जगजाहिर है। इन दोनों से लालू और तेजस्वी की दुश्मनी के बारे में सभी जानते हैं। कन्हैया कुमार सिर्फ बिहार के ही नहीं हैं, वे बेगूसराय से संसदीय चुनाव भी लड़ चुके हैं। हालांकि वे चुनाव नहीं जीत पाए, लेकिन बिहार में लोगों को उनका चेहरा पसंद है। संसदीय चुनाव में कन्हैया को सफलता इसलिए नहीं मिल पाई, क्योंकि वहां से आरजेडी ने भी अपना उम्मीदवार उतारा था। उस समय वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के उम्मीदवार थे।

कन्हैया होंगे कांग्रेस का चेहरा!

 कन्हैया अब कांग्रेस के साथ हैं और पार्टी ने उन्हें लंबे समय से कोई जिम्मेदारी नहीं दी है। इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उन्हें बिहार से आजमाने की योजना बना रही थी, लेकिन लालू के दबाव के चलते उन्हें टिकट नहीं मिल सका। आखिरकार कांग्रेस ने उन्हें दिल्ली से मैदान में उतारा। लालू को जैसे ही कन्हैया कुमार के इस बार चुनाव लड़ने का संकेत मिला, उन्होंने अपने तेवर सख्त कर लिए और इंडिया ब्लॉक में राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठा दिए। लेकिन, इस बार कांग्रेस भी किसी दबाव में आने के मूड में नहीं है।

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कांग्रेस चाहती है 70 सीटें

कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और बिहार कांग्रेस प्रभारी शाहनवाज आलम ने तीन बातें कहकर आरजेडी के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। सबसे पहले उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा लोकसभा चुनाव के स्ट्राइक रेट के आधार पर होगा। अब वे कह रहे हैं कि अगर इंडिया ब्लॉक की सरकार बनी तो दो उपमुख्यमंत्री होंगे। उनका तीसरा पॉइंट था कि इंडिया ब्लॉक में कोई छोटा या बड़ा भाई नहीं है और सीटों में कटौती कांग्रेस को मंजूर नहीं होगी।

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बदला लेने को भी तैयार हैं पप्पू

पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव खुद को कांग्रेस का सिपाही मानते हैं। उन्होंने अपनी जन अधिकार पार्टी का कांग्रेस में विलय इसलिए किया था कि पार्टी उन्हें पूर्णिया से लोकसभा उम्मीदवार बनाएगी। बताया जाता है कि प्रियंका गांधी ने भी उन्हें इसका भरोसा दिलाया था। आखिरी वक्त में सबकुछ बदल गया। लालू-तेजस्वी पहले ही बीमा भारती को राजद उम्मीदवार घोषित कर चुके थे। हालांकि बिहार में भारत ब्लॉक की बड़ी पार्टी होने के नाते उन्होंने लालू यादव और तेजस्वी यादव से उनके आवास पर मुलाकात भी की थी। हद तो तब हो गई जब तेजस्वी यादव ने पूर्णिया की एक सभा में कहा कि अगर राजद को वोट नहीं दे सकते तो एनडीए को वोट दें, लेकिन पप्पू यादव को बिल्कुल भी वोट न दें। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पप्पू को अपना हथियार बनाएगी। उसे तेजस्वी से बदला लेने का मौका भी मिलेगा।

कन्हैया से डरते हैं तेजस्वी

तेजस्वी कन्हैया कुमार से डरते हैं। कन्हैया उनसे ज्यादा पढ़े-लिखे हैं। वे दो संसदीय चुनाव लड़ चुके हैं। अपने तार्किक भाषणों से कन्हैया अपने विरोधियों पर कुछ समय के लिए असर छोड़ जाते हैं। जेएनयू के दिनों से ही उनकी वामपंथी पहचान रही है, अब उन्हें कांग्रेस में होने का भी फायदा मिल सकता है, जो बीजेपी की धुर विरोधी है। अगर इंडिया ब्लॉक की सरकार बनती है और कन्हैया उस टीम में शामिल होते हैं तो यह तेजस्वी के लिए खतरनाक होगा क्योंकि लोग दोनों की बातों, विचारों, तर्कों और शिक्षा की तुलना करने लगेंगे। इसे तेजस्वी के लिए राजनीतिक तौर पर शुभ नहीं माना जाएगा।

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इसलिए लालू चल रहे हैं यह चाल

लालू नहीं चाहते कि कांग्रेस बिहार विधानसभा चुनाव में पप्पू यादव और कन्हैया कुमार के चेहरे को आगे करे। वह यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस पहले की तरह आरजेडी की पिछलग्गू बनी रहे। ताकि सीटों के बंटवारे में उनकी मर्जी चल सके। इस बार आरजेडी पिछली बार की तरह कांग्रेस को 70 सीटें देने के मूड में नहीं है। कांग्रेस ने पिछली बार 70 में से सिर्फ 19 सीटें जीती थीं, जिसकी वजह से तेजस्वी के उभरने के बावजूद सीएम नहीं बन पाए। कांग्रेस को भी सीटों में कमी का डर है। इसलिए दोनों तरफ से तनाव दिख रहा है। कांग्रेस हाल के लोकसभा चुनाव के स्ट्राइक रेट के आधार पर टिकट बंटवारा चाहती है। अब तो उसने दो डिप्टी सीएम का भी दावा ठोक दिया है। इसका मतलब है कि दोनों तरफ से दबाव की राजनीति चल रही है।

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